परछाई

धुंधली सी तस्वीर बचपन की, आईने की तरह साफ नज़र आती है,
जब मेरी ही परछाई सामने मेरे तरह तरह की लीलाएँ दिखाती है,
कब वक़्त गुज़र जाता है दिन से रात ,हफ्तों से महीने…
अब तो साल गुज़र रहे हैं…
काश..!रफ्तार धीमी कर पाती इन लम्हों की…
आख़िर इतनी जल्दी क्यों बड़ी होती हैं “बेटियां”…..

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बेख़याली

कुछ तो बात होगी उन बातों में ,
जो बेसबर कर जाती हैं
ख़्वाबों को इत्र से सराबोर कर जाती हैं,
ख़ुमार बेइंतहा ,क्या कहें…..
होश से तो अच्छी अपनी ये बेख़याली ….
कुछ तो बात होगी…. उन बातों में…….

-पल

इश्क़

हमको कहाँ ख़बर थी , दिल की पसंद क्या है
बेवज़ह ही बने मुजरिम जब दिल किसी पे आया
इश्क़ की ना कोई भाषा और ना ही परिभाषा
जां से क़ीमती जब कोई शक्श नज़र आया।
सीरत का होश किसको सूरत लुभावनी जब
ना कोई जोर इसपे ये मोह है या माया।

– पल

हसरत

हसरत ही कुछ अलग है, किस्मत है ख़ूब वाकिफ़
फ़ितरत ही कुछ अलग है, इन्तज़ार है ख़ता का
हद्द भी है चीज़ कोई, इनकार दिल को इससे
ख्वाहिश की है लड़ाई, ख्वाबों में ही सुलह है
हकीकत है खूबसूरत, पर ख़्वाब भी हैं अपने
दिल की है ज़िद हमारे, पूरी हो सारी हसरत…

-पल